आगे बढ़ने की होड़ में

।। आगे बढ़ने की होड़ में ।।



मज़बूती थी पहले कभी रिश्तों की डोर में ।
टूट रहा आहिस्ते से आगे बढ़ने की होड़ में ।


मज़हब और धर्म में अब बंट गया इंसान है ।

कौड़ियों के भाव में अब बिक रहा ईमान है ।।

खो रहा अपनत्व भाव दिखावे के शोर में ।

टूट रहा आहिस्ते से आगे बढ़ने की होड़ में ।।


महक फूलों में नही अब शीशियों में बिकता है ।

मन उलझा हो तो एक जगह कहाँ टिकता है ।।

खो रहा अस्तित्व है आधुनिकता के शोर में ।

टूट रहा आहिस्ते से आगे बढ़ने की होड़ में ।।

रेखाअस्मिता

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