आगे बढ़ने की होड़ में
टूट रहा आहिस्ते से आगे बढ़ने की होड़ में ।
मज़हब और धर्म में अब बंट गया इंसान है ।
कौड़ियों के भाव में अब बिक रहा ईमान है ।।
खो रहा अपनत्व भाव दिखावे के शोर में ।
टूट रहा आहिस्ते से आगे बढ़ने की होड़ में ।।
महक फूलों में नही अब शीशियों में बिकता है ।
मन उलझा हो तो एक जगह कहाँ टिकता है ।।
खो रहा अस्तित्व है आधुनिकता के शोर में ।
टूट रहा आहिस्ते से आगे बढ़ने की होड़ में ।।
रेखाअस्मिता

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